रसूख वाले कानून को बपौती समझते हैं ....
रुचिका को आखिर २० साल बाद न्याय मिला ,राठौर को कम ही सही लेकिन सजा तो मिली , लेकिन एक चीज़ जोऐसे मामले को देकते हुए सामने आते है वो ये की , रसूख वाले मुजरिम क़ानूनी रफ़्तार को अपने हिसाब से गति देने में पूरी तरह सफल रहते है , लोगो को मीडिया का धन्यवाद्...
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मनीष झा
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[25 May 2010 12:00 PM]



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