दो ऐसा वरदान प्रभो !
परचिन्तन, परहित, परसेवा, परमार्थ के काज करूँपवन - गति से चलूँ सत्य पे, सदा झूठ से लाज करूँवैर - भाव न रखूं किसी से, दो ऐसा वरदान प्रभो !झुकूं सदा मैं सभी के आगे, सबके हृदय पे राज करूँ...
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[25 May 2010 10:31 AM]



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