चौखट पे कुछ गुमसुम बैठा, माँ अब तू सूनापन है....

दिल की कलम से... नन्हे मचल रहे हाथों और पैरों के आघात सहे...हाथों के झूले मे मुझको अपने तू दिन रात लिए...मूक शब्द तब इन नैनों के तू ही एक समझती थी...रुदन कभी जो मेरा सुनती तू अकुलाई फिरती थी...अंजाने इस जग में मेरे तू ही प्रेम भरा घन थी..रोता हंसता और बिलखता माँ तू मेरा... [पूरी पोस्ट]
writer दिलीप
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[25 May 2010 10:15 AM]

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