जंगल की हवा अब तो शहरों में भी चलती है
पुर-दर्द निदा और बू-ए-ग़ोश्त उभरती है जंगल की हवा अब तो शहरों में भी चलती है आतिश से मुफ़लिसी की, जल जाए लकीरे-बख़्त भूनी हुई मछली भी, हाथों से फिसलती है वो रोटियाँ बुनता है बदन भूख का ढ़कने को शब-सर्द जुलाहे की, घुटनों में गुजरती है अब चाँद सितारे भी हैं...
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प्रताप नारायण सिंह
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[25 May 2010 07:54 AM]



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