'माज़ी..'
..."समझ सके जो..रूह का शामियाना..ऐसी..मशाल चाहता हूँ..तेरी इबादत में..बिक जाऊँ..ऐसा..जुनूँ चाहता हूँ..लम्हों के बादल..फलक की मेहँदी..ऐसा..तौहफा चाहता हूँ..आफ़ताब-सा लोहा..महताब-सी सुराही..ऐसा..दरिया चाहता हूँ..ए-माज़ी..तुझमें..सिमटना चाहता हूँ..!!"......
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Priyankaabhilaashi
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[25 May 2010 04:08 AM]



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