विचारों का बादल...........
विचारों का बादल उमड़ते घुमड़ते आ ही जाते हैशब्द जाल के उधेड़ बुन में जकड़ ही जाते हैव्याकरण की चाशनी में डूब ही जाती हैवर्ण-छंद के लय ताल में पिरो दी जाती हैलेखनी की झुरमुटों से जब निकलता हैविचार मात्र विचार ही नहीं वांग्मय बन जाता हैकृति ये ज्योत...
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ana
kavita
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[24 May 2010 11:52 AM]



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