बड़ा हो तो गया मैं, बड़ा बन नही पाया...

दिल की कलम से... माफ़ी चाहूँगा आजकल घर आया हूँ तो ब्लोग्स पढ़ नहीं पा रहा....जल्दी ही पढूंगा....कल एक आदमी था ज़ख्मी, सड़क पे पड़ा...मैं भी वहीं उससे कुछ दूर ही था खड़ा...कुछ इंसानियत जगी, कुछ आगे बढ़ा...तभी कुछ सोचा, ठिठका, और रुक गया...देर हो रही थी मुझे कहीं और जाना... [पूरी पोस्ट]
writer दिलीप
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[24 May 2010 12:12 PM]

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