हादसे -मुंबई और मंगलौर के बीच मन
हादसे एक ही बात कहते हैं मंगलौर में हो या मुंबई में इंसान के रचे हों या कुदरत से भुगते कि सांसों का कोई भरोसा नहीं सबसे अनजानी, अपरिचित सांसें ही हैं कभी भी, कहीं भी फिसल सकती हैं अनुलोम-विलोम के बीच जब रोकती हूं सांसों को कुछ पलों के लिए अंदर ही तो लगता...
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डॉ वर्तिका नन्दा
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[24 May 2010 11:07 AM]



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