मिट्टी मेरी.... न जाने कैसी है, है?-(कुंवर जी)
आज ही घर से वापिस आया हूँ!बहुत कुछ पढ़े बिना छोट गया होगा!थकान भी बहुत हो रही है!कुछ भी नया जो लिखा गया उस से संतुष्टि सी नहीं मिली सो आज पुरानी कविता फिर आपके समक्ष........ किसी का भी दुःख मै नहीं बाँट सकता हूँ,किसी की भी राहों से कांटे मै नहीं छाँट सकता...
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kunwarji's
अगर मै कहूं......
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[24 May 2010 10:02 AM]



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