यह मॉल है या कि अजायबघर है.. ?
पुन: आपका स्वागत है परिकल्पना पर अभी पिछले चरण में रश्मि रविजा जी ने बड़े ही सार्थक और नपे-तुले शब्दों में मॉल संस्कृति के बिभिन्न पहलूओं पर डाला .......परिचर्चा के बाद आईये निखिल आनंद गिरि की एक कविता पर नज़र डालते है जो मॉल संस्कृति पर केन्द्रित है...
[पूरी पोस्ट]
रवीन्द्र प्रभात
सत्रहवां दिन
17
3
0
3
2
[24 May 2010 07:17 AM]



Shuffle








