चल गांधी की राह बदन पर लगा लंगोटी

तीखी नज़र घटे साल के अन्त तक महंगाई की आयुतब तक रामगरीब तू खा प्यारे जल वायुखा प्यारे जल वायु छोड़ रोटी का टुकड़ाबन संतोषी जीव सुना मत नाहक दुखड़ादिव्यदृष्टि मत मार रोज शासन को सोंटीचल गांधी की राह बदन पर लगा लंगोटी... [पूरी पोस्ट]
writer दिव्यदृष्टि
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[24 May 2010 06:46 AM]

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