हमारे देश की अधिकाँश जनता की बुनियादी जरूरतें नहीं पूरी हो पातीं

परिकल्पना अधिकार प्यार का ..ओ रूपसी,आज तुमने अपनी पर्ण-कुटी के द्वार नहीं खोले,बस भीतर ही खिलखिलाती रही,चिडियों का समूह दानों की प्रतीक्षा में है,जरा खोलो तो द्वार,मैं भी देखूं तुम्हारा आरक्त चेहरा,बिखरे सघन बाल,फ़ैल गए टीकेवाला चेहरा,जानूँ तो सही-किसे ये अधिकार... [पूरी पोस्ट]
writer रवीन्द्र प्रभात

सत्रहवां दिन

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[24 May 2010 06:29 AM]

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