दूभ
बिना जिल्द की वह फटी पुरानी कापी, अपनी सब किताब की ढेरी से मैं अलग रखा करता हूं जिस पर बीच बीच में थककर मैं कुछ नया लिखा करता हूं । वैसे तो पढ़ने की इस मेज पर हैं बहुत कापियां जिस पर मैं धरती और नक्षत्र लिखा करता हूं लेकिन दबी किनारे सबसे नीचे बीते वर्ष...
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आर्जव
कविता
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[24 May 2010 01:13 AM]



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