करोड़ों की गर्मी

Navbharat Times Blogs गर्मी विकट है। लू लपट में जाइए, तो लगता है कि अब अंत निकट है। पर अंत होता नहीं है, बच जाते हैं। जान बची और लाखों पाए मुहावरे के हिसाब से देखें, तो अब रोज लाखों ही मिल रहे हैं। गर्मी जाते-जाते करोड़ों देकर जाएगी। अब क्या चाहिए गर्मी से। खैर यह दिल्ली शहर... [पूरी पोस्ट]
writer आलोक पुराणिक
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[24 May 2010 00:49 AM]

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