कल्पनातीते
वह अधर के कोर पर अटकी हुई सी मुस्कुराहटवह नयन में एक चंचल भाव पलकें खोलता साभाल का वह बिन्दु जिसमे सैकड़ों तारे समाहितकंठ का स्वर शब्द में ला राग मधुरिम घोलता साकल्पनातीते ! मेरी सुधि में तुम्हारी छवि मनोहरलेख बन कर इक शिला का हर घड़ी है साथ मेरेस्वर्णमय...
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राकेश खंडेलवाल
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[23 May 2010 21:51 PM]



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