शायद वहाँ रात नहीं हुआ करती……
रात के सन्नाटे में बेबस कदम पुराने टीले की तरफ बढ़ते हैं…… सुना है, वहाँ उनका राज है, जिन्हें अपने जीवन से शिकायतें थी अधूरे उजाले से रोशन, टीला अब भी डरावना लगता है खुद में समेटे अनगिनत सिसकियॉ टीला अब भी खामोश है बरसों पहले सूख चुके कुएँ से सड़ी गन्ध आज...
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Manish
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[23 May 2010 17:32 PM]



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