ऐसी भी क्या चुप्पी कल को चुप्पी ही हमपर चिल्लाए...
कौओं ने यूँ शोर मचाया,कोयल भूली अपनी कूके...वंशीस्वर हैं घुटे घुटे से, बजती हैं बस बम बंदूके...बड़ी उड़ाने भरी गगन मे, अब केवल कुछ जले पंख हैं...युध हुआ प्रारंभ कभी का, और हम थामे अभी शंख हैं...ऐसा ना हो खडग बान सब धरे धरे से ही रह जाए... ऐसी भी क्या...
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दिलीप
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[23 May 2010 12:45 PM]



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