क्रूर ये समय
प्रिय,आज हूं मैं हिंस्रआक्रामक...उत्तेजितकिसी आदमखोर पशु सा उन्मत्त!ढूंढ रहा हूं घड़ी के आविष्कारक को...मिल जाए / तो / तोड़ दूं उसका सर...जब तुम अपने हाथ पर बंधी कलाई घड़ी देखते होमन करता हैजला दूं संसार की सारी घड़ियों कोजिन्होंने बांध रखी है...
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चण्डीदत्त शुक्ल
कविता
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[23 May 2010 11:06 AM]



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