छोड़ दी मैंने तल्खियाँ
कल शाम एक अजीब सा मंज़र पेश आयातेरा गुरूर मुझसे मेरा हाल पूछने आयाकितना पहरे बैठाए थे तूनेखुद पर खुद की आरजुओं परये गज़ब कैसे हुआ मगरतुझ पर तेरा ही न बस चल पायाकल शाम एक अजीब सा मंज़र पेश आयातेरा गुरूर मुझसे मेरा हाल पूछने आयाउसके आने की न मुझको खबर हुईन...
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डॉ. राजेश नीरव
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[23 May 2010 00:31 AM]



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