एक और मंज़र - ट्रैफिक सिग्नल का
होंठ हिलते हैं भिखारी के, सुनाई नहीं देताहाथ के लफ़ज़ उछलते हैं, वो कुछ बोल रहा है,थपथपाता है हर इक कार का शीशा आकरऔर उजलत में हैट्रैफ़िक के सिग्नल पे नज़र है!चेंज है तो सहीकौन इस गर्मी में अब कार का शीशा खोले,अगले सिगनल पे ही सहीरोज़ कुछ देना ज़रूरी है,...
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Pavan
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[22 May 2010 16:42 PM]



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