आजकल फ़िलहाल..
क्या बताएं कब औ क्या करना है जी हुज़ूरकैसे जीना, या किस तरह मरना है जी हुज़ूरवैसे हैं जितने वक्त, ये मौका-ए-कायनात मेंहर शाम घर में चूल्हा भी जलना है जी हुजूरफिर मान भी लें रस्म-ए-नंगई का है रिवाज़ आदत हमें नहीं, ये बदन ढंकना है जी हुजूरअब बेघर कहाँ रहेंगे...
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जोशिम
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[22 May 2010 14:48 PM]



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