इसीलिए मेरी तुलना धरती से की गई है रे पुरूष !
तुमने सिर्फ़ उड़ान देखी है ............पीड़ा नहीं देखी मेरे परों कीजो तुमने क़तर डालेख़ून नहीं देखा तुमने बहता हुआक्योंकि तुमदेखना ही नहीं चाहते दर्पणतुम्हें तो चाहिए बस समर्पणहर हाल में,हर सूरत मेंक्योंकि तुम शोषक हो जन्म-जन्मान्तर सेसंस्कार पुराने...
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कविता नारी वेदना सम्मान धरती
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[22 May 2010 14:31 PM]



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