एक अकवितामय जीवन . . . . . .

सुनिये मेरी भी.... ...मेरे 'अकवि' मित्रों,झेलिये आज यह... 'अकविता' जैसा ही कुछ...साला जीवन इतना अकवितामय क्यों है ?निकला हूँ घर से ठान केमिलूँगा कविता सेजी भर देखूंगाछुऊंगा दोनों हाथ सेमहसूस करूंगाखाऊंगा भी आज पी जाऊंगा उसकोभोगूंगाओढ़ूंगा-बिछाउंगारखूंगा हरदम साथआखिर इन्सान... [पूरी पोस्ट]
writer प्रवीण शाह
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[22 May 2010 12:14 PM]

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