आवाज दूं समन्दर को
अर्थों के किनारों तकनहीं पहुंचती बहुत सी लहरें।आंखों की गलियों केबादल, बारिश से ये रिश्ते थेउन बूंदों के नाम नहीं थेइन्हें आंसू कहा,जो कभी झरते थे,कभी रिस्ते थे।क्या कहते हैं उस अन्तर को?सीने में फैली बाढ़बहुत सी दीवारें तोड़ती हैमोड़ती है मेरा...
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Rajey Sha
कविता Kavita
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[22 May 2010 09:18 AM]



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