जब उसने बच्चे के मुँह मे दो दाँतों को उगते देखा...
चौराहे पे कुछ बूढ़े से अरमानों को जलते देखा...भिखमंगे की एक लाश को, अधनंगी सी सडते देखा...झुग्गी मे मौसम इक इक कर बचा कुचा सब लील रहा था...वही पास के एक महल में मौसम रोज़ बदलते देखा....फूलों का इक बाग सजाकर नागफनी इक उसमे बोया...ग़लती की थी, हमने हर इक...
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दिलीप
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[22 May 2010 08:28 AM]



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