“उदास चेहरे सिसकते हुए हजार मिले” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)
"ग़ज़ल"वफा की राह में, घर से निकल पड़े हम तो,डगर में फैले हुए झाड़ और खार मिले!खुशी की चाह में, भटके गली-गली हम तो,उदास चेहरे सिसकते हुए हजार मिले!!हमारे साथ तो बस दिल की दौलतें ही थी,खुदा की बख्शी हुई चन्द नेमते ही थी,मगर यहाँ तो हमें सिर्फ खरीदार...
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डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक
ग़ज़ल
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[22 May 2010 07:55 AM]



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