जनाब 'सरवर' की दो ग़ज़ल
ग़ज़ल : इक ज़रा सी देर को ...... इक ज़रा सी देर को नज़रों में आने के लिए तुम ने ’सरवर’ किस क़दर एहसान ज़माने के लिए ! इक तमन्ना, एक हसरत ,इक उम्मीद ,इक आरज़ू है अगर कुछ तो यही है सर छुपाने के लिए काम क्या आया दिल-ए-मुज़्तर मक़ाम-ए-ज़ीस्त में एक दुनिया आ गई बातें...
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आनन्द पाठक
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[22 May 2010 06:59 AM]



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