मन के भीतर भी खिलता है कोई फूल जैसे गुलमोहर
चिलचिलाती धूप हो कि संघर्षों की तपन,बैचेन होता है तन और मन भी हो जाता है उदासकि मिल जाए कहीं छांव सजर कीकि मिल जाए छांव आंचल कीतपती दुपहरी में बैचेन मन को सुकून देती हैं यादेंवो पल वो लम्हे जो कभी बीते थे स्नेह की, प्रेम की छांव में।ऐसे ही संघर्ष पथ के...
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satish aliya
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[22 May 2010 06:26 AM]



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