एक ग़ज़ल : जूनून-ए-इश्क में ......
जुनून-ए-इश्क़ में हमने न जाने क्या होगा ! हैं इतने बेख़ुदी में गुम कि हम को क्या पता होगा मैं अपने इज़्तिराब-ए-दिल को समझाता हूँ रह रह कर कि जितना चाहता हूँ वो भी उतना चाहता होगा हमें मालूम है नाकामी-ए-दिल, हसरत-ए-उल्फ़त हमें तो आख़िरी दम तक वफ़ा से वास्ता...
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आनन्द पाठक
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[22 May 2010 06:05 AM]



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