कवच [एक चित्र काव्य]

दर्शन-प्राशन नयन चार करना नवीनता यही क्षणिक पहला पागलपन नहीं मिलन को आती तन्वी रेतीला होता मेरा मन मेरे आकर पास कल्पना कर देती है मुझको कायर सुरबाला को देखूँ अपलक उत्कंठित रहता है अंतर कोस रहा है कब से सच्चा नख से शिख तक तुमको निज मन लगी को आकर कौन बुझाय मिलन को... [पूरी पोस्ट]
writer Pratul

पहला पागलपन

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[22 May 2010 05:45 AM]

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