ऐसी होती है दोपहर

safar ke sajde mein आँखों में कटता है पहरऐसी होती है दोपहरजीवन की दुपहरी दम माँगेनाजुक मोड़ों पर तन्हाईचुभता सूरज भी ख़म माँगेखोल ज़रा तू हाले-जिगरऐसी होती है दोपहरप्राण साथी का ही काँधा माँगेतप कर पिघली है तरुणाईघिरे बदरा से बरखा माँगेतपता आसमाँ भी गया है ठहरऐसी होती है... [पूरी पोस्ट]
writer शारदा अरोरा
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[22 May 2010 04:13 AM]

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