सुना है कि खुदगर्ज दुआएँ मिलती नहीं

जीवन के पदचिन्ह सुलग कर रह गया चाँद फलक पर, अंधियारी रातों में शोखियाँ चलती नहीं मांग लेता खुदा से मैं भी तुझको पर,सुना है कि खुदगर्ज दुआएँ मिलती नहीं क्या करता मैं नुमाइश इन ज़ख्मों कीमुर्दा-दिलों में टीस कोई उठती नहीं दौड़ना रही मजबूरी मेरी उम्र भर... [पूरी पोस्ट]
writer Sudhir (सुधीर)

चिंतन

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[22 May 2010 01:55 AM]

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