लोकतंत्र के अप्स एंड डाउंस

अस्तित्व शुक्रवार की शाम थी.... इंतजार के पहले दिन के मुहाने पर बैठे थे, अभी एक दिन और बाकी था। अपने एक जैसे रूटिन में सन्डे का इंतजार करते रहने के दौरान यूँ ही एक तुकबंदी रच डाली थीसोम, मंगल खुमारबुध, गुरु उतार शुक्र, शनि इंतजारतब कहीं आता है रविवार....हाँ तो... [पूरी पोस्ट]
writer डॉ. अमिता नीरव
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[22 May 2010 00:46 AM]

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