कोई कैसे कहेगा, जिंदा है अब हम
तोड़ बैठे रिश्ता-ए-ज़िदगी ही हमकोई कैसे कहेगा, ज़िदा है अब हमअब न उदास धड़कनें हैं न प्यास हैन तुम, न तुम्हारी याद, न खुशी, न ग़मन मचलते अरमाँ है, न बदहवासी का आलमअब तो हमारी तनहाई है और है हमतोड़ बैठे रिश्ता-ए-ज़िदगी ही हमकोई कैसे कहेगा, ज़िदा है अब हमन...
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डॉ. राजेश नीरव
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[22 May 2010 00:53 AM]



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