भगजोगनी .....
जुल्फें सियाह खोल दूँ तो, मौसम हो बिजलियों के देखूं तेरी तकदीर में हैं, कितने साए रकीबों के मेरा देर से आना, तेरे रुख़ की वो उलझी शिकनखुलेगा फिर दफ़्तर वही, हज़ार शिकायतों केतुम्हें जाँ बना लिया मगर, अभी सोचना होगा मुझे जाने मेरी तक़दीर में...
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'अदा'
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[21 May 2010 18:39 PM]



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