“अब भी बाकी है, आशा की एक किरण” (डॉ0 रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक)

शब्दों का दंगल पिछले कई वर्षों से मैं दो-मंजिले पर रहता हूँ। मेरे कमरे में तीन रोशनदान हैं। उनमें जंगली कबूतर रहने लगे थे। वहीं पर वो अण्डे भी देते थे, परन्तु कानिश पर जगह कम होने के कारण अण्डे नीचे गिर कर फूट जाते थे। मुझे यह अच्छा नही लगता था। एक दिन कुछ फर्नीचर... [पूरी पोस्ट]
writer डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक

संस्मरण

views
16
upvote
2
downvote
0
rating
2
comments
5
[21 May 2010 13:18 PM]

Free Vedic Astrology From Astrobix