कल रात को मैं कुछ लिख न पाया !
मुझको मेरी रहमदिली ने सताया,कल रात को मैं कुछ लिख न पाया !धीमी- आहिस्ता शाम ढल रही थी,मेरे सामने इक शमा जल रही थी !तभी फिर वहाँ एक परवाना आया,कल रात को मैं कुछ लिख न पाया !पतंगा कोई एक गीत गा रहा था,शम्मा के इर्द-गिर्द मंडरा रहा था !प्यार के जुनून में था...
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पी.सी.गोदियाल
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[21 May 2010 09:06 AM]



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