अशोक कुमार पाण्डेय की एक कविता
एक पुरस्कार समारोह से लौटकरवह सीकरी का दरबार ही था भरा-पूराऔर वहां संत ही थे सारेयह ग़र्मियों की एक ख़ुशनुमा शाम थीजब शहर के सारे पेड़ मुरझा चुके थेउस लान की घास रंगों से भी ज़्यादा गहरी हरी थीऔर इतनी ताज़ी कि शायद ओस भी शर्माती होगी उन पर गिरने से...
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शिरीष कुमार मौर्य
युवा कविता
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[21 May 2010 08:07 AM]



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