“परछाँई की तासीर बदल जाती है” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)
आमन्त्रण में बल हो तो , तस्वीर बदल जाती है। पत्थर भी भगवान बनें, तकदीर बदल जाती है।। अपने अधरों को सीं कर, इक मौन निमन्त्रण दे दो, नयनों की भाषा से ही- मुझको आमन्त्रण दे दो, भँवरे की बिन गुंजन ही- तदवीर बदल जाती है। आमन्त्रण में बल हो तो , तस्वीर बदल...
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डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक
गीत
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[21 May 2010 05:51 AM]



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