प्रतिबिम्ब
अकेलेपन के साए सच लगते हैं इस अंधेर कमरे में कुछ ढूँढता एक कदम लम्बे रास्ते चले थे एक, निकले कई थामे वक़्त का हाथ दूर निकल आये अरसा लगता है पल-पल पिछड़े मोड़ पर थमे थे न मूड़ सके हम, रुके कई यह कैसी है जंजीरें पैरों में लिए फिरते है सीने से लगाये [...]...
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mequitnever
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[21 May 2010 02:04 AM]



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