भर्तृहरि नीति शतर्क-मणि होने के बावजूद विषधर से कोई प्रेम नहीं करता
आरंभगुर्वी क्षयिणी क्रमेण लघ्वी पुरा वृद्धिमति च पश्चात्। दिनस्य पूर्वाद्र्धपराद्र्ध-भिन्ना छायेव मैत्री खलसज्जनानाम्।।जिस तरह दिन की शुरूआत में छाया बढ़ती हुई जाती है और फिर उत्तरार्द्ध में धीरे-धीरे कम होती जाती है। ठीक उसी तरह सज्जन और दुष्ट की...
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दीपक भारतदीप
आध्यात्म
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[20 May 2010 23:15 PM]



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