आततायी शहर की तरफ आ रहे हैं ~~
आज अपनी एक व्यंग्य कविता आपको सुना रहा हूँ. कविता का शीर्षक है : आततायी शहर की तरफ़ आ रहे हैं -- और यह मेरी तलवार जो सिरहाने रखकर सोया था ....................
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M VERMA
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[20 May 2010 21:57 PM]



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