जिक्र हो फूलों का बहारों की कोई बात हो....
जिक्र हो फूलों का बहारों की कोई बात हो रात का मंजर हो सितारों की कोई बात होरेत पर चलते रहे जो पाँव कुछ हलके से थेग़ुम निशानी हो अगर इशारों की कोई बात हो नाख़ुदा ग़र भूल जाए जो कभी मंजिल कोईमोड़ लो कश्ती वहीं किनारों की कोई बात होआ ही जाते हैं कभी...
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'अदा'
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[20 May 2010 18:21 PM]



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