जिक्र हो फूलों का बहारों की कोई बात हो....

काव्य मंजूषा जिक्र हो फूलों का बहारों की कोई बात हो रात का मंजर हो सितारों की कोई बात होरेत पर चलते रहे जो पाँव कुछ हलके से थेग़ुम निशानी हो अगर इशारों की कोई बात हो नाख़ुदा ग़र भूल जाए जो कभी मंजिल कोईमोड़ लो कश्ती वहीं किनारों की कोई बात होआ ही जाते हैं कभी... [पूरी पोस्ट]
writer 'अदा'
views
35
upvote
5
downvote
0
rating
5
comments
17
[20 May 2010 18:21 PM]

Free Vedic Astrology From Astrobix