मैं कवि बन गया ......

TAPASHWANI तुम ग़ज़ल बन के जो,आ गयी सामने |बस तुम्हे पढके ही,मैं कवि बन गया |तेरी हर इन्द्रियाँ,यूँ थी अनुपात में |देखते देखते ही,नज़म गढ़ दिया |तेरे यौवन कि मदिरा,बही इस तरह |घूरते-घूरते मैं,कहीं बह गया |होंठ से दाँत कि,जंग को देख कर,क्या बताऊँ तुम्हे,मैं कहाँ खो... [पूरी पोस्ट]
writer Tapashwani Anand
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[20 May 2010 12:55 PM]

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