काश!
काफिला मेरा भी होता, आज तब मंजिल के पास,भोर होते चला होता, मंजिल की जानिब मै काश!जज्बातों से क्या मिला, मंजिल मिली न रास्ता,आँखों ने नींदे खोई और हर पल रहा दिल उदास,एक परिंदा, एक दरिंदा उड़ रहे हैं, साथ साथ,एक को जीने की ख्वाहिश एक को लहू की प्यासहिम्मत...
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pawan dhiman
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[08 May 2010 16:40 PM]



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