मिले लट्ठ मेरा तुम्हारा...तो सर फटे हमारा
***राजीव तनेजा*** “ठक्क- ठक्क”…. “ठक्क……ठक्क- ठक्क”…. “आ जाओ भाई…आ जाओ…यहाँ तो खुला दरबार है…कोई भी आ जाओ"… “नमस्कार!…गुप्ता जी….कहिये अब तबियत कैसी है आपकी?”… “मेरी तबियत को क्या हुआ है?”… “मुसद्दीलाल के मुंह से उड़ती-उड़ती खबर सुनी थी कि जब से आप उस...
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राजीव तनेजा
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[20 May 2010 05:05 AM]



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