अगर मौलाना नूरूल हुदा की जगह बाल ठाकरे होते तो....अज़ीज़ बर्नी

Aziz Burney यह क्या हो गया हैं हमें? क्यों इतने बेहिस हो गए हैं हम? क्या नैतिकता और क़ानून के दायरे में रहकर भी हम हक़ और इन्साफ़ के लिए आवाज़ नहीं उठा सकते? क्यों हमें यह इंतिज़ार रहता है कि जब तक यह आग हमारी ड्योढ़ी तक नहीं पहुंचेगी तब तक हम मौन ही रहेंगे? क्या... [पूरी पोस्ट]
writer Aziz Burney
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[20 May 2010 04:47 AM]

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