एक असैनिक व्यथा...
दोस्त मेरे !अच्छे लगते होअपनी आवाज बुलंद करते हुयेमुल्क के हर दूसरे मुद्दे परजब-तब, अक्सर हीकिशब्द तुम्हारे गुलाम हैंकिकलम तुम्हारी है कनीज़बहुत भाते हो तुमओ कामरेड मेरे !कवायद करते हुयेसूरज को मिलते अतिरिक्त धूप के खिलाफबादल को हासिल अनावश्यक पानी के...
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गौतम राजरिशी
एक फौजी की डायरी से...
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[20 May 2010 04:30 AM]



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