gazal
आज हमारे बीच ये हालात कैसे हैंसमझना ही ना चाहो सवालात कैसे हैंआईने में तुम ही हो तुम में आईना भी है बहार निकल आने के खयालात कैसे हैंहो गयी है जिंदगी चीजों के ऊंचे दाम सी बचे हुए अब अपने दिन रात कैसे हैंचहरे की झुलसी खाल में धंसी हुई...
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jagdeep singh
ग़ज़ल
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[20 May 2010 04:21 AM]



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