प्यासी धरती - प्यासे मन!
बंजर धरती दरकन माटी की,दरका देती हैदिल सैकड़ों के.पर क्या करते?गर आंसुओं से बुझती प्यास हर आँखइतना रोती औ'नीर बहा देती, प्यास से पपड़ाये होंठों की प्यासशीतल कर देती.मन में उमड़ते विचारों के बादल इतना बरसातीआकाश में उठी...
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रेखा श्रीवास्तव
kavita
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[20 May 2010 04:36 AM]



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